Dard Manjta Hai By Ran Vijay

 

दर्द मांजता है

द्वारा           : रण विजय

प्रकाशन : साहित्य संचय

शीर्षक :-

तजुर्बे किसी और के हों या स्वयं के, अमूमन कुछ न कुछ सिखा कर ही जाते हैं। और फिर घटनाक्रम में वास्तविकता का पुट भी तो वहीं से मिलता है। इस संग्रह की कहानियां भी कुछ अपने आस पास की देखी  हुयी घटनाओं पर कुछ तो कुछ रोज़ मर्रा की जिंदगी से उठाई गयीं हैं कुछ अपने कुछ औरों के तजुर्बे कुछ खट्टे तो कुछ बे-मज़ा से,  “दर्द मांजता है” शीर्षक नाम से भी एक सुन्दर भावनात्मक प्रेम कहानी है इस पुस्तक में किन्तु शीर्षक से संग्रह के दर्द भरी कहानियों का संग्रह होने का भ्रम कदापि नहीं होना चाहिए।  

 


क्यूँ पढ़ें:-

सामन्यतः जन जीवन के किस्सों से जुड़ी बातें ही हैं चाहे तो उन्हें कहानी भी कह लें, अपनी बाते लगती हैं क्यूंकि रण  विजय जी  द्वारा  पात्र और घटना क्रम का  जिस ख़ूबसूरती से सृजन एवं प्रस्तुतीकरण किया गया है वह वास्तविकता के बेहद करीब तक ले जाता है। पात्रों को इतनी सुन्दरता से गढ़ा गया है की वे सजीव हो उठे हैं। बिना किसी बाह्य आडम्बर के एक सरल पठनीय पुस्तक है।

कथाकार:-

रण विजय जी के साहित्य जगत में प्रवेश के बाद उत्तम व सरल साहित्य की चाहत रखने वालों की खोज काफी हद तक पूरी हो गयी । पाठक उनके नाम व काम से  अब तलक बखूबी परिचित हो चुके हैं । समीक्षित पुस्तक  उनका पहला कहानी संग्रह था। अपनी रचनाशीलता का प्रयोग समसामयिक विषयों पर अच्छे साफ सुथरे सार-गर्भित साहित्य को रचने में कर रहे हैं । विचारों में स्पष्टता और सरल सहज व सामान्य भाषा का प्रयोग  पाठक को कथानक से जोड़ कर रखता है एवं विषय के प्रति लेखक की निष्ठा को दर्शाता है ।

उनकी  पुस्तक भोर उसके हिस्से की “दिल है छोटा सा“ सफलता के शीर्ष  पर है एवं आम जन द्वार इन  पुस्तको को  अत्यंत पसंद किया गया है, उनकी कहानियां कहने के तरीके उनमें प्रबल आत्मविश्वास एवं  अपनी कला पर पूर्ण भरोसे का परिचय देते हैं  उनकी शुरूआती कहानियों में भी, कहीं से अपरिपक्वता की मामूली सी भी झलक नहीं मिलती। लेखन में उच्च गुणवत्ता व विचारों में स्पष्टता है.


भाव एवं भाषा शैली:-

पुस्तक की भाषा सरल तो है ही वह संवाद कहें तो आम जन की बोल चाल ही है कहीं संवाद का विशेष प्रयास द्वारा लिखा जाना प्रतीत नहीं होता।  सहज प्रवाह में,  घटनाक्रम पात्र एवं परिवेश के मुताबिक भाषा है वक्यांश छोटे ही हैं। कथानक अलग से चुन कर उन्हें कहानी लिखने हेतु अथवा कथानक के रूप में ढालने हेतु तोडा मरोड़ा गया हो ऐसा प्रतीत नहीं होता, वरन कहानी लिखने हेतु कोई प्रयास कथानक को लेकर किया हो ऐसा भी नहीं है, क्यूंकि कहानी आम जन से जुड़ी  उनके जीवन की रोज़ की बातें ही हैं कोई विशिष्ठ घटना क्रम नहीं अतः किसी विशेष तैयारी  जैसा आभास नहीं मिलता।

सुन्दर वाक्यों के कहने हेतु क्लिष्टता लादी जाये, या उसका उपस्थित होना अनिवार्य हो,  ऐसा  तो कदापि नहीं  है एक उदाहरण इसी पुस्तक से देखें जहाँ वाक्यांश  बिना किसी  क्लिष्टता के कितने सुन्दर बन पड़े हैं :

:-“दर्द में भी संगीत है, रस है। दर्द का भी बटवारा लोग कर लेते हैं। कैसे देवता स्वरूप लोग वे हो सकते हैं।  इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मेरे साथ मौजूद है”

 :-“पिता का साया ईश्वर द्वारा प्रदत्त तमाम कृपाओं में से उस तरह का है जिसे हम उसके न होने के बाद ही जान पाते हैं की हमसे क्या छिन  गया।” 

:- “ जैसे खिले हुए दिन में सूरज की अच्छी चमक होती है शरारती हवाओं की अठखेलियाँ होती हैं एक खुशनुमा अहसास होता है उसको देख कर लगता था जैसे यह सब उसकी जिंदगी से गायब है। परन्तु इस सबके होने की संभावनाएं थीं, आवश्यकता थी तो सोयी भावनाओं को जागृत करने की और दिन के खिलने का इंतज़ार करने की।

अतः संक्षेप में कहें तो भाषा,  भाव एवं उसकी अभिव्यक्ति के अनुकूल सहज सरल एवं बोधगम्य है।


पुस्तक समीक्षा :-

वंचित :- 

बेहद खूबसूरति से कॉरपोरेट जगत के कल्चर,  काम के दबाव,  बढ़ते टार्गेट्स के प्रेशर का तनाव जैसे विषयों को तो कहीं प्रेम को आवश्यकता से जोड़ते चले गए अब कहीं ये आवश्यकता आगे बढ़ने के लिए सीढी जैसे थी तो किसी के लिए घर से दूर रूहानी और जिस्मानी ज़रूरतों को पूरा करने की। प्रौढ़ता की दहलीज़ पर खड़े कॉरपोरेट जगत के चार सफल  एक्जिक्यूटिव  युवावस्था की तकरीबन 20 वर्षों पुरानी यादों को ताजा करते हुए कथानक के मुख्य विषय की और चलते है या कहें की मुख्य विषय ही यहाँ से चल रहा है। कहानी में यह तो नहीं दर्शया गया है कि अन्य पात्र भावनाएं दिखलाने में या अपनी पारिवारिक ज़िंदगी के विषय में कितने ईमानदार थे,  किंतु  उस दौरान विनीत की भावनाओं का चित्रण बहुत वास्तविक है। वहीं मानसी की प्रतिक्रिया जिसने विनीत को इस्तेमाल किया और पत्नी  का तंज की आज क्यों बता रहे हो बहुत कुछ सोचने को विवश करता है.

मेरे भगवान”:-

बेहद सरल,  सहज प्रवाह में सीधी सीधी गांव की बात है जहां सहृदयता है,  मेहनत है किन्तु व्यावसायिकता,  द्वेष जैसी बात नहीं है, जो आज के समय में विरले ही नज़र आती है।  मास्टर जी की निस्वार्थ  भाव से की गई मदद एवं काम शुरू करने हेतु दिया गया विचार उनकी उज्ज्वल छबि को और उज्जवल बनाता है व उनकी नि:श्छलता दर्शाता है।  गांव के आम छोटे छोटे किस्से साथ में लिए हैं।  अंत प्रभावित करता है। सम्पूर्ण कहानी सुन्दर है, किन्तु लेखक का यह पहला कथा संग्रह होने के बावजूद भी कहीं भी कथानक को क्लिष्ट व सुंदर शब्दों से सजाने का  अतिरिक्त प्रयास नज़र नहीं आता।  जो कि उनके आत्मविशवास  का परिचायक है।   

कागज़ी फैसला:-

 अधिकतम भाग में रेल विभाग के आंतरिक कार्य कलाप से संबंधित बातें कही गयीं हैं,  एवं लेखक के स्वयं के तजुर्बों का अच्छा निचोड़ वहां देखने को मिलता है किंतु थोड़ी बोझिलता उत्त्पन्न करता है।  घटनाक्रम विवरण अच्छा है किन्तु कहानी के स्तर पर पाठक की संबद्धता एवं अंत को लेकर उत्सुकता,  दौनो ही बिंदुओं पर और  कार्य किया जाना अपेक्षित  है।   

दर्द माँजता है:-

लातूर  भूकंप के परिदृश्य में,  दिल्ली से सहायता करने पहुंचे चार युवा जो दिल्ली में रहकर आई।  ए।  एस।  की तैयारी कर रहे थे, उनमें से एक युवा की व एक घायल बेसहारा  लड़की की कहानी केंद्र में है। वहीं  इस विभीषिका के बीच प्यार की कोमल कोपल कैसे अपना वजूद तलाश कर जड़ें जमाने में कामयाब होती है,  कैसे एक अविश्वास,  पहले कच्चे और  फिर पक्के विशवास में बदलता है।  मानवता और प्रेम रस के साथ साथ  थोड़ा पुट अल्हड़ता का भी देखने को मिलता है। लेखक आई ए  एस की तैयारी से संबंधित अपने तजुर्बों को कहानी में प्रविष्ट करने के लोभ संवरण नहीं कर सके किन्तु उनसे कहानी में वास्तविकता की बहुत सुन्दर झलक दीखने लगी।  वाक्य बहुत छोटे है एवं कहीं कहीं सम्बद्ध से प्रतीत होते है जो कि यथार्थ में नहीं हैं।  किंतु प्रथम प्रयास की  तुलना में अत्युत्तम कार्य है।   

छद्म” :-

एक युवक के इंटरव्यू के दौरान उसके परिचय एवं शिक्षण सम्बंधित कागजात को लेकर उपजे शक का दायरा कैसे फैलता हुआ एक सोची समझी साजिश तक पहुँचता है बहुत ही सिलसिलेवार तरीके से किसी जासूसी कहानी के लेखक की मानिंद तहकीकात का विवरण प्रस्तुत किया है और संभवतः किसी वास्तविक घटना से जोड़ने का प्रयास भी, किन्तु यहाँ भी पाठक को कथानक से जोड़ पाना कुछ पीछे छूट  गया प्रतीत हुआ।  

राजकाज:-

पुनः एक विभागीय घटनाक्रम को कहानी बनाने  का प्रयास किया गया है जो की बहुत हद तक सफल कहा जा सकता है। साथ ही राजकीय कार्य शैली, आपदा में अवसर तलाश  कर भ्रष्टाचार को अंजाम देते हुए उक्ति को चरितार्थ करते अधिकारी एवं किसी भी घटना का स्तर अफसर के ऊपर आने वाले दबाव से समानुपातिक होना जैसी बातों को कार्यालयीन ढर्रे  के अक्स में रखते हुए विस्तार से दर्शाया है। साथ ही घटना की जिम्मेवारी किस तरह से निचले स्तर के कर्मचारी पर आती जाती है तर्कसंगत रूप में दिखलाया है। दायित्वों को निचले स्तर पर धकेलने की नीति, ज़िम्मेवारियों से बचाव एवं कमीशनखोरी को बहुत सधे तरीके से दिखलाया है।

 

“ट्रेन, बस और लड़की” :-

बहुत सुन्दरता से एक अनछुए विषय को  कथानक के माध्यम से चुना है।  यूं  तो आम युवा का लड़की को प्रभावित करना,  मिलने का मौका निकलना, समय देख चिट्ठी पहुँचाना जैसे प्रसंग हैं किन्तु कथानक के  मूल में,  लड़की की जिस मनोदशा का परिचय दिया गया है वह नया है। प्रस्तुति सुन्दर है व युवाओं की बातचीत एवं सम्बंधित भाव इत्यादि खुलकर उभरे हैं।  

समीक्षित टिप्पणी :-

·                    प्रस्तुतीकरण सरल सहज एवं रोचकता से परिपूर्ण है।

·                    भाषा आम जन की सामान्य भाषा है अतः सहज ग्राह्य है।

·                    क्लिष्ट गूढ़ विषय से दूरी एवं सरल प्रस्तुति कथानक से करीब लाते  हैं।

·                    रोचक, पठनीय, मनोरंजन से परिपूर्ण कहानी संग्रह है।    

 

सविनय,

अतुल्य  

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